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कीरत बारी बनाम रूपन बारी: एक इन्फोग्राफिक

दो वीर, एक नाम: एक ऐतिहासिक भ्रम

कीरत बारी और रूपन बारी की अलग-अलग शौर्यगाथाओं की पड़ताल

एक दृष्टि में अंतर

विशेषता कीरत बारी (मेवाड़) रूपन बारी (बुंदेलखंड)
कालखंड 16वीं शताब्दी (लगभग 1536 ई.) 12वीं शताब्दी (लगभग 1182 ई.)
क्षेत्र मेवाड़ (राजस्थान) बुंदेलखंड (मध्य भारत)
परिभाषित कार्य राजकुमार उदय सिंह के प्राणों की रक्षा ‘डेढ़ पहर का युद्ध’ लड़ना
भूमिका कर्तव्यनिष्ठ सेवक, रणनीतिकार महान योद्धा, दूत
प्रमुख सहयोगी पन्ना धाय आल्हा और ऊदल

वीर कीरत बारी: कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक

16वीं सदी के मेवाड़ में, जब सिंहासन के लिए षड्यंत्र रचे जा रहे थे, कीरत बारी ने अपनी बुद्धि और साहस से इतिहास की धारा बदल दी।

संकट में मेवाड़ (1536 ई.)

राणा सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ कमजोर हो गया था। बनवीर ने शासक विक्रमादित्य की हत्या कर सिंहासन पर कब्जा कर लिया और अब उसकी नजर अंतिम वैध उत्तराधिकारी, युवा राजकुमार उदय सिंह पर थी।

साहसी पलायन की योजना

🛡️
पन्ना धाय का त्याग: अपने पुत्र चंदन को राजकुमार की जगह सुलाया।
🧺
कीरत बारी की युक्ति: राजकुमार को जूठी पत्तलों की टोकरी में छिपाया।
🏰
किले से पलायन: ‘अपवित्र’ टोकरी को कोई नहीं छूता, इस समझ का लाभ उठाकर सुरक्षित बाहर निकले।

वीर रूपन बारी: शौर्य के शिखर

12वीं सदी के बुंदेलखंड में, रूपन बारी एक ऐसे योद्धा थे जिनका नाम ही शत्रु सेना में भय पैदा कर देता था।

4.5

घंटे का युद्ध

1

योद्धा

पूरी सेना के विरुद्ध

‘डेढ़ पहर का युद्ध’: एक अनूठी चुनौती

‘आल्ह-खंड’ के अनुसार, जब रूपन बारी दूत बनकर जाते, तो वे अपने शुल्क (‘नेग’) के रूप में अकेले ही लगभग साढ़े चार घंटे तक पूरी सेना से लड़ने का अवसर मांगते थे। यह उनकी अद्वितीय वीरता और आत्मविश्वास का प्रतीक था। बुखारे पर चढ़ाई हो या राजा अभिनंदन से युद्ध, उन्होंने हर बार अपनी इस चुनौती को पूरा किया।

एक संयुक्त विरासत: भ्रम की उत्पत्ति

आधुनिक बारी समुदाय ने इन दोनों नायकों के गुणों को मिलाकर एक शक्तिशाली प्रतीक बनाया है। यह चार्ट दर्शाता है कि कैसे कीरत की ‘सेवा’ और रूपन के ‘शौर्य’ का विलय हुआ है, जिससे एक समग्र नायक का निर्माण हुआ।

© 2024 | यह इन्फोग्राफिक भारतीय इतिहास के दो महान, किंतु अलग-अलग नायकों को श्रद्धांजलि है।

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