बुंदेलखंड का गुमनाम सितारा: बारी समाज के वीर सपूत, स्वतंत्रता सेनानी श्री भगवती प्रसाद बारी की शौर्यगाथा

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल कुछ प्रसिद्ध चेहरों तक सीमित नहीं है। इसकी नींव में उन अनगिनत गुमनाम नायकों का रक्त, पसीना और बलिदान है, जिनकी कहानियाँ अक्सर इतिहास के पन्नों में खो जाती हैं। ऐसे ही एक महान व्यक्तित्व थे मध्य प्रदेश की वीर भूमि बुंदेलखंड के श्री भगवती प्रसाद बारी। वे न केवल बारी समाज के गौरव थे, बल्कि एक ऐसे साहसी स्वतंत्रता सेनानी भी थे, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिलाने में अपनी जवानी न्योछावर कर दी। उनकी कहानी साहस, त्याग और अटूट देशभक्ति की एक मिसाल है।

प्रारंभिक जीवन और क्रांति की पृष्ठभूमि

श्री भगवती प्रसाद बारी का जन्म 20वीं सदी के शुरुआती दौर में सागर की ऐतिहासिक धरती पर हुआ था। यह वह समय था जब भारत पराधीनता की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, लेकिन देश के कोने-कोने में आजादी की ज्वाला धीरे-धीरे सुलग रही थी। बारी जी का बचपन और किशोरावस्था इसी माहौल में बीती। उन्होंने अपनी आँखों से अंग्रेजी शासन का अन्याय और भारतीयों का शोषण देखा। महात्मा गांधी, भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों के विचारों और बलिदान की खबरें उन जैसे युवाओं के दिलों में देशभक्ति का सागर भर रही थीं। श्री बारी अपने समुदाय, बारी समाज, के एक स्वाभिमानी और होनहार युवक थे, और उन्होंने समाज सेवा के साथ-साथ राष्ट्र सेवा को ही अपने जीवन का परम लक्ष्य बना लिया।

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन: जब सागर में गूंजी क्रांति

श्री भगवती प्रसाद बारी के क्रांतिकारी जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय 1942 में शुरू हुआ, जब महात्मा गांधी ने “भारत छोड़ो आंदोलन” का शंखनाद किया और ‘करो या मरो’ का नारा दिया। इस नारे ने पूरे देश में बिजली की तरह चेतना दौड़ा दी। सागर में भी क्रांति की यह लहर पूरे वेग से पहुँची। श्री बारी इस आंदोलन में एक युवा नेता के रूप में उभरे।

उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर युवाओं को संगठित किया। वे दिन में भेष बदलकर गाँवों और कस्बों में जाकर लोगों को आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित करते और रात में गुप्त बैठकें कर आगे की रणनीति बनाते। उनके जोशीले भाषणों और निडर व्यक्तित्व ने बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित किया। उन्होंने सागर में विरोध प्रदर्शनों, हड़तालों और जुलूसों के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका लक्ष्य था अंग्रेजी प्रशासन के कामकाज को ठप्प करना और यह संदेश देना कि भारत अब गुलामी स्वीकार नहीं करेगा।

अंग्रेजी हुकूमत का दमन और अदम्य साहस

युवा भगवती प्रसाद की बढ़ती लोकप्रियता और क्रांतिकारी गतिविधियाँ ब्रिटिश पुलिस की आँखों में खटकने लगीं। आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने दमन चक्र तेज कर दिया। सागर के कई स्वतंत्रता सेनानियों की तरह, श्री भगवती प्रसाद बारी को भी गिरफ्तार कर लिया गया।

गिरफ्तारी के बाद उन पर अमानवीय अत्याचारों का दौर शुरू हुआ। उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ने के लिए हर संभव प्रयास किया गया। अंग्रेजों का मानना था कि यदि वे इस युवा नेता को झुका देंगे, तो आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा। उन्हें पहले सागर जेल और बाद में जबलपुर की सेंट्रल जेल में रखा गया, जो उस समय के सबसे खतरनाक राजनीतिक कैदियों के लिए जानी जाती थी। जेल की कठोर यातनाएं, खराब भोजन और अमानवीय परिस्थितियाँ भी उनके फौलादी इरादों को डिगा नहीं सकीं। वे जेल की सलाखों के पीछे से भी अपने साथियों को संदेश भेजते और उनका मनोबल बढ़ाते रहे। उनका शरीर कैद में था, लेकिन उनकी आत्मा आजाद थी।

स्वतंत्रता के बाद का जीवन और विरासत

वर्षों की कैद और यातनाओं के बाद जब देश आजाद हुआ, तो श्री भगवती प्रसाद बारी जैसे वीरों के बलिदान को आखिरकार मंजिल मिली। स्वतंत्र भारत की सरकार ने उनके योगदान को कभी नहीं भुलाया। राष्ट्र के प्रति उनकी निःस्वार्थ सेवा के सम्मान में, उन्हें भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित “ताम्रपत्र” प्रदान किया गया। यह ताम्रपत्र केवल धातु का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि उनके त्याग, संघर्ष और देशभक्ति का जीवंत प्रमाण था।

आजादी के बाद, श्री बारी ने एक शांत और सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत किया, लेकिन वे सामाजिक कार्यों में हमेशा सक्रिय रहे। वे अपने बारी समाज के युवाओं के लिए एक आदर्श और प्रेरणा के स्रोत बने रहे।

निष्कर्ष

श्री भगवती प्रसाद बारी की जीवन गाथा यह दर्शाती है कि नायक केवल बड़े शहरों या प्रसिद्ध परिवारों में ही जन्म नहीं लेते। वे हमारे बीच, छोटे शहरों और कस्बों में भी होते हैं, जो चुपचाप राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। आज जब हम स्वतंत्रता की खुली हवा में सांस ले रहे हैं, तो हमें श्री भगवती प्रसाद बारी जैसे अनगिनत सेनानियों के बलिदान को याद रखना चाहिए। वे सिर्फ बारी समाज या बुंदेलखंड के ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के सच्चे सपूत थे, जिनकी कहानी पीढ़ियों को राष्ट्रप्रेम और निस्वार्थ सेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी।

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