भारतीय बारी समाज: शौर्य, त्याग, स्वाभिमान और प्राचीन विरासत की अमर गाथा

संकलन आधार: श्री अशोक बारी (घोगर, रीवा, मध्य प्रदेश) के ऐतिहासिक दस्तावेजों, समाज की मौखिक परंपराओं एवं रामायण-मध्यकालीन संदर्भों पर

1. प्रस्तावना: इतिहास के पन्नों में दबी एक गौरवशाली विरासत

भारतीय इतिहास केवल राजाओं, साम्राज्यों और विजयों की कहानियों तक सीमित नहीं है। यह उन समाजों और कुल-परंपराओं का भी वर्णन है जिन्होंने अपनी तलवार, निष्ठा, त्याग और पसीने से राष्ट्र की रक्षा की। इन्हीं गौरवशाली जातियों में से एक है—बारी समाज

अक्सर मुख्यधारा के इतिहास में कुछ समाज अपने उचित श्रेय से वंचित रह जाते हैं, लेकिन जब हम गहराई में उतरते हैं, तो पता चलता है कि राजसत्ता को सुरक्षित रखने, धर्म की रक्षा करने और स्वाभिमान को सर्वोच्च रखने में बारी समाज का योगदान अद्वितीय रहा है। यह समाज राजपरिवारों के विश्वसनीय अंगरक्षक (Royal Bodyguards), सामंत और स्वामिभक्त योद्धा के रूप में सदियों से जाना जाता रहा है।

श्री अशोक बारी जी द्वारा संकलित दस्तावेजों के अनुसार, इस समाज की यात्रा गुजरात के सोलंकी (चालुक्य शाखा) साम्राज्य से शुरू होकर बघेलखंड के दुर्गम पठारों तक फैली है और इसकी जड़ें त्रेता युग की रामायण तक पहुंचती हैं। यह लेख केवल अतीत का दस्तावेज नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा-पुंज है कि कैसे उनके पूर्वजों ने “घास की रोटी” खाना स्वीकार किया, लेकिन अपने स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं किया।

2. पौराणिक जड़ें: त्रेता युग (रामायण काल) में बारी समाज

बारी समाज का इतिहास मध्यकाल तक सीमित नहीं है। तुलसीदास जी कृत रामचरितमानस में रावण-पुत्र नरांतक वध के प्रसंग में एक महत्वपूर्ण दोहा आता है:

“नरांतक नृप कर जो बारी, तेहीकर सेवक में लघुचारी। धूमकेतु तेहि उतर न दिन्हां कछु डरि पुन निज मारग लिन्हा॥”

यहां “बारी” शब्द का प्रयोग राजा के निकटतम, विश्वसनीय रक्षक या प्रधान सेवक के अर्थ में किया गया है। समाज की मान्यता है कि त्रेता युग में भी “बारी” एक सम्मानजनक पदवी थी, जो राजघराने की सुरक्षा और निकटता का प्रतीक थी। कुछ परंपराओं में बारी समाज को राम काल के सारस्वत पंडितों से भी जोड़ा जाता है, जो भगवान राम के लिए भोजन तैयार करते थे।

राम-रावण युद्ध में सुग्रीव-पुत्र दधिवल (या देवांतक/नरांतक वधकर्ता) को समाज का प्रथम प्रमुख योद्धा माना जाता है। ये संदर्भ बारी समाज को प्राचीन क्षत्रिय परंपरा से जोड़ते हैं और सिद्ध करते हैं कि “बारी” शब्द की गरिमा हजारों वर्ष पुरानी है।

3. उद्गम और मध्यकालीन उदय: गुजरात का सोलंकी वंश से बघेलखंड तक

बारी समाज का लिखित इतिहास गुजरात के प्रतिष्ठित चालुक्य (सोलंकी) वंश से जुड़ा है।

  • 950 ई. की शुरुआत: दक्षिण भारत के चालुक्यों की एक शाखा ने गुजरात के अन्हिलवाड़ (पाटन) में सोलंकी राज्य स्थापित किया। यह वह दौर था जब स्थापत्य कला और वीरता चरम पर थी। बघेल शासक भी इसी वंश की शाखा थे।
  • 1298 ई. का संकट: दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने गुजरात को तहस-नहस कर दिया। अंतिम शासक कर्णदेव थे। इस पराजय के बाद कई क्षत्रिय कुलों को अपने अस्तित्व और धर्म की रक्षा हेतु उत्तर भारत की ओर पलायन करना पड़ा।
  • बघेलखंड में नया सूर्योदय (1233-1239 ई.): वीरधवल (वीर सिंह) के पुत्र बाघदेव (बाघराव) तीर्थ यात्रा पर उत्तर भारत आए। चित्रकूट-कालिंजर क्षेत्र में अवसर देखकर उन्होंने कालिंजर से 16 मील दूर “मरफा” दुर्ग पर अधिकार जमाया। अपने साथ आए गुजराती योद्धाओं और परिवारों की बस्ती को “बघेल बारी” नाम दिया गया – यही नाम बारी समाज और बघेल राजवंश के अटूट संबंध का प्रमाण है।
  • महाराणा प्रताप का चित्रण – मेवाड़ की वीरता का प्रतीक, जहां बारी समाज ने योगदान दिया

    This painting depicts a Rajput–Mughal cavalry battle, and it is ...

4. राज्य विस्तार, कूटनीति और बारी योद्धाओं का पराक्रम

बघेलखंड में सत्ता स्थापित करना आसान नहीं था। स्थानीय लोधी, भर और परिहार शक्तियों से कड़ा संघर्ष हुआ।

  • गोहरा और कसौटा की विजय: बाघदेव ने कूटनीति से तिवारी मंत्रियों को पक्ष में किया और बारी योद्धाओं के बल पर गोहरा रियासत जीती।
  • वैवाहिक संबंध:
    • बाघदेव का विवाह तरौहा के परिहार राजा मुकुंददेव की इकलौती पुत्री सिन्दूरमती से।
    • पुत्र करण देव का विवाह बांधवगढ़ के राजा सोमदत्त करचुली की पुत्री पदमकुंवारी से – दहेज में बांधवगढ़ राज्य प्राप्त हुआ, जो बाद में रीवा रियासत की राजधानी बना।
  • बारी योद्धाओं की भूमिका: दस्तावेज स्पष्ट कहते हैं कि “बघेलों के साथ आए बारी योद्धाओं ने उन्हें कभी निराश नहीं किया।” ये योद्धा राज्य विस्तार के हर मोर्चे पर अग्रिम पंक्ति में रहे।

5. सामाजिक स्थिति: रक्षक, सामंत और राजसी पदवी

क्षत्रिय राजवंशों में राजपरिवार की सुरक्षा सबसे संवेदनशील जिम्मेदारी होती थी। यह दायित्व बारी समाज को सौंपा जाता था।

  • अंगरक्षक की भूमिका: बारी जाति के लोग राजाओं के निकटतम रक्षक (Bodyguards) होते थे।
  • सामंत दर्जा: इस विश्वास के कारण उन्हें सामंत की पदवी और राजसी सम्मान प्राप्त था।
  • प्रमुख ऐतिहासिक योद्धा:
    • राजा शिवदीन सिंह बारी (उत्तर प्रदेश)।
    • कीरत बारी (मेवाड़): पन्ना धाय के साथ मिलकर उदय सिंह (महाराणा प्रताप के पिता) की जान बचाई – टोकरी में राजकुमार छिपाकर किले से बाहर निकाला।
    • रामबक्स बारी, मनगईयां बारी, छैल बारी, सुदिष्ठ बारी (रीवा राज्य)।
    • रूपन बारी (महोबा – आल्हा-ऊदल काल के महान योद्धा)।

6. मुगल काल की अग्निपरीक्षा: घास की रोटी और अटूट स्वाभिमान

मुगल शासन में जब कई क्षत्रिय कुलों पर “रोटी-बेटी” के संबंध बनाने का दबाव डाला गया, तब बारी समाज ने स्पष्ट इनकार किया।

  • जंगल का रास्ता अपनाया गया।
  • घास की रोटी खानी पड़ी, लेकिन गरिमा नहीं छोड़ी।
  • यह त्याग महाराणा प्रताप की तरह था – कष्टपूर्ण लेकिन सम्मानजनक।

श्री अशोक बारी जी लिखते हैं कि यह समय बारी जाति के लिए “बुरा समय” नहीं, बल्कि “सम्मानजनक समय” था, क्योंकि उन्होंने अपनी शर्तों पर जीवन जिया।

7. वर्तमान परिदृश्य और भविष्य का आह्वान: शिक्षा रूपी नया शस्त्र

आज बारी समाज मुख्य रूप से मध्य प्रदेश (रीवा, सतना, सीधी), उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य क्षेत्रों में फैला हुआ है। मुख्य पेशे कृषि, व्यापार, सरकारी सेवा आदि हैं।

श्री अशोक बारी जी का स्पष्ट संदेश:

  • अतीत में सम्मान तलवार और बाहुबल से मिलता था।
  • वर्तमान कलयुग और लोकतंत्र में सम्मान का आधार शिक्षा है।
  • ब्राह्मण समाज का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि केवल शिक्षा के बल पर वे हर क्षेत्र में अग्रणी हैं।
  • बारी समाज को भी शिक्षित, संगठित और एकजुट होकर अपना खोया हुआ “सामंत” जैसा सम्मान वापस प्राप्त करना होगा।
  • समाज में सामूहिक विवाह, मेधावी छात्र सम्मान, जयंती समारोह जैसे आयोजन हो रहे हैं। युवाओं से अपील है – इतिहास को जानो, गर्व करो और शिक्षा से आगे बढ़ो।

सोलंकी काल का एक प्रतिनिधि मंदिर, गुजरात (बारी समाज की उत्पत्ति से जुड़ा क्षेत्र)

Solanki Dynasty Monument in Gujarat | Inheritage Foundation ...

Solanki Dynasty Monument in Gujarat | Inheritage Foundation …

निष्कर्ष: एक मशाल जो सदैव जलती रहे

बारी समाज का इतिहास संघर्ष, सुरक्षा, त्याग और स्वाभिमान का त्रिवेणी संगम है। रामायण के रक्षकों से लेकर बघेलखंड के सामंतों, मेवाड़ के स्वामिभक्तों और मुगलों के सामने अडिग खड़े योद्धाओं तक – हर कदम पर इस समाज ने वीरता का परिचय दिया है।

आज यह गौरवशाली विरासत हमें सिखाती है कि चुनौतियां कितनी भी बड़ी हों, एकता, शिक्षा और स्वाभिमान से उन्हें पार किया जा सकता है। श्री अशोक बारी जी द्वारा संकलित यह जानकारी केवल दस्तावेज नहीं, बल्कि एक प्रज्वलित मशाल है। अब समय है कि हम इस मशाल को आगे ले जाएं और समाज को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाएं।

जय बारी समाज! जय भारत!

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