भाग 1: प्रस्तावना – एक बहुआयामी पहचान का परिचय
परिचय
भारतीय समाज का ताना-बाना अनगिनत जातियों और समुदायों के धागों से बुना गया है, जिनमें से प्रत्येक का अपना एक अनूठा इतिहास, संस्कृति और पहचान है। इन्हीं समुदायों में से एक है ‘बारी’ जाति, जो पारंपरिक रूप से पत्तों से बने पात्रों—पत्तल और दोने—के निर्माण के विशेषज्ञ के रूप में जानी जाती है । यह साधारण सा प्रतीत होने वाला पेशा वास्तव में एक अत्यंत जटिल सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को अपने भीतर समेटे हुए है। बारी समुदाय का इतिहास केवल उनके शिल्प तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिव्य उत्पत्ति की पौराणिक कथाओं, मध्यकालीन वीरता के आख्यानों, औपनिवेशिक नृवंशविज्ञान के विरोधाभासी वर्णनों और आधुनिक भारत में अपनी पहचान को पुनर्परिभाषित करने के संघर्षों का एक जीवंत दस्तावेज है। यह समुदाय, जो कभी हिंदू समाज की अनुष्ठानिक शुद्धता की व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था, आज अपनी विरासत और भविष्य के बीच एक नए संतुलन की तलाश में है ।
अध्ययन का उद्देश्य और संरचना
इस विस्तृत रिपोर्ट का उद्देश्य बारी जाति की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कथाओं से लेकर उनके ऐतिहासिक विकास, सामाजिक संरचना और समकालीन यथार्थ का एक समग्र, गहन और बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करना है। यह केवल तथ्यों का संकलन नहीं, बल्कि उन आख्यानों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और सामाजिक प्रक्रियाओं का संश्लेषण है जिन्होंने बारी समुदाय की पहचान को गढ़ा है। इस रिपोर्ट की संरचना को कई भागों में विभाजित किया गया है। प्रारंभ में, हम उन पौराणिक और लोक-कथाओं का अन्वेषण करेंगे जो समुदाय के आत्म-बोध का आधार हैं। इसके बाद, हम औपनिवेशिक काल के नृवंशविज्ञानियों द्वारा किए गए अध्ययनों और जाति-उत्पत्ति के विभिन्न समाजशास्त्रीय सिद्धांतों के आलोक में बारी समुदाय के ऐतिहासिक स्थान का मूल्यांकन करेंगे। तत्पश्चात, हम उनके सामाजिक ताने-बाने, पारंपरिक व्यवसायों, धार्मिक जीवन और आधुनिक चुनौतियों पर प्रकाश डालेंगे। अंत में, हम समकालीन सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य, विशेषकर बिहार जाति सर्वेक्षण जैसे हालिया घटनाक्रमों के संदर्भ में उनकी स्थिति का विश्लेषण करते हुए एक सारगर्भित निष्कर्ष प्रस्तुत करेंगे।
एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण: भारतीय बारी और अफ्रीकी बारी
विषय की स्पष्टता हेतु यह प्रारंभ में ही स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यह रिपोर्ट पूर्णतः भारत में पाई जाने वाली ‘बारी’ जाति पर केंद्रित है। वैश्विक संदर्भ में, अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिण सूडान में नील नदी के किनारे ‘बारी’ नामक एक पूर्णतः भिन्न और असंबंधित कृषि-पशुपालक जातीय समूह भी निवास करता है । इन दोनों समूहों के बीच कोई भी ज्ञात ऐतिहासिक, भाषाई या सांस्कृतिक संबंध नहीं है। इस लेख में अफ्रीकी बारी का उल्लेख केवल इस संभावित भ्रम को दूर करने और अध्ययन के दायरे को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने के लिए किया गया है।
भाग 2: उत्पत्ति के दर्पण में: पौराणिक एवं लोक-आख्यान
किसी भी समुदाय की पहचान उसके उत्पत्ति आख्यानों में गहराई से निहित होती है। ये कथाएँ केवल अतीत की कहानियाँ नहीं, बल्कि वर्तमान की सामाजिक स्थिति को वैधता प्रदान करने, गौरव को स्थापित करने और सामूहिक अस्मिता को आकार देने का शक्तिशाली माध्यम होती हैं। बारी समुदाय के पास ऐसे आख्यानों का एक समृद्ध और विविधतापूर्ण भंडार है, जिसमें दिव्य रचना से लेकर वीरता, बलिदान और कुलीन वंश के दावे शामिल हैं।
दिव्य उत्पत्ति की कथा: परमेश्वर, मिट्टी और शुद्धि का विधान
बारी समुदाय की उत्पत्ति से जुड़ी सबसे रोचक और महत्वपूर्ण कथा वह है जो उन्हें सीधे ईश्वरीय विधान से जोड़ती है।
आख्यान का विस्तृत वर्णन
इस पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक समय परमेश्वर (ईश्वर) ने एक विशेष अनुष्ठान का आयोजन किया और सभी वर्णों व जातियों को आमंत्रित किया। उन्होंने घोषणा की कि जो भी उनके द्वारा दिया गया एक विशेष उपहार (‘विक्रय दान’) स्वीकार करेगा, उसे अपने सामाजिक पद से एक स्तर नीचे आना होगा। इस शर्त को सुनकर सामाजिक प्रतिष्ठा खोने के भय से ब्राह्मणों सहित अन्य सभी उच्च जातियों ने वह उपहार लेने से इनकार कर दिया । तब परमेश्वर ने अपनी लीला से मिट्टी का एक पुतला बनाया और उसमें प्राण फूंक दिए। वह जीवित मानव प्रकट हुआ और उसने ईश्वर को प्रणाम किया। उस व्यक्ति ने उपहार स्वीकार करने की इच्छा जताई, परंतु एक शर्त रखी—कि उसकी जाति को सभी लोग सदैव शुद्ध और मान्य मानेंगे। परमेश्वर ने उसकी शर्त स्वीकार कर ली और उसकी जाति की पवित्रता को प्रमाणित करने के लिए, उन्होंने उस व्यक्ति से एक प्याले में जल लाने को कहा। जब वह जल लेकर आया, तो परमेश्वर ने सभी वर्णों के समक्ष उस जल को पीकर यह सिद्ध कर दिया कि वह व्यक्ति और उसका वंश शुद्ध है। इसके बाद सभी ने उसकी जाति की शुद्धता को स्वीकार कर लिया। उस व्यक्ति के उत्तम गुणों और सुंदर स्वरूप के कारण उसका नाम ‘सुंदर’ रखा गया और यहीं से बारी जाति की शुरुआत मानी जाती है ।
ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण और प्रतीकात्मक विश्लेषण
यह कथा केवल मौखिक परंपरा तक सीमित नहीं है। इसका दस्तावेजीकरण ब्रिटिश नृवंशविज्ञानी आर.वी. रसेल (R.V. Russell) ने 1916 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध कृति “The Tribes and Castes of the Central Provinces of India” में भी किया है। रसेल द्वारा दर्ज की गई कथा लगभग समान है, जिसमें परमेश्वर (विष्णु) के ‘विक्रय दान’ को ब्राह्मणों द्वारा अस्वीकार किए जाने और फिर मिट्टी से एक व्यक्ति के निर्माण का वर्णन है, जो इस शर्त पर दान स्वीकार करता है कि उसकी जाति को शुद्ध माना जाएगा ।
इस कथा का प्रतीकात्मक महत्व गहरा है। ‘मिट्टी से सृजन’ का प्रतीक इसे प्रजापति ब्रह्मा की सृजन कथाओं से जोड़ता है, जो कुम्हार जैसी अन्य सृजनकर्ता जातियों में भी पाया जाता है । लेकिन इसका सबसे शक्तिशाली प्रतीक ‘जल से शुद्धि’ का है। हिंदू समाज की वर्ण-व्यवस्था शुद्धता और प्रदूषण की अवधारणा पर आधारित है, जहाँ यह तय होता है कि किसके हाथ से जल या भोजन स्वीकार्य है और किसके हाथ से नहीं । इस संदर्भ में, स्वयं ईश्वर द्वारा बारी के हाथ से जल ग्रहण करना एक असाधारण और क्रांतिकारी दावा है। यह उन्हें एक अद्वितीय “शुद्ध” सेवा जाति के रूप में स्थापित करता है, जिनसे ब्राह्मण भी जल स्वीकार कर सकते हैं—एक ऐसी स्थिति जो उन्हें कई अन्य सेवा जातियों से सामाजिक पदानुक्रम में ऊपर रखती है ।
शौर्य और वीरता की परंपरा: वीर शिरोमणि रूपन बारी

यदि दिव्य उत्पत्ति की कथा बारी समुदाय को अनुष्ठानिक पवित्रता प्रदान करती है, तो वीर शिरोमणि रूपन बारी का आख्यान उन्हें शौर्य और वीरता की एक गौरवशाली परंपरा से जोड़ता है।
रूपन बारी का परिचय
रूपन बारी को 11वीं सदी के महोबा के प्रसिद्ध योद्धाओं, आल्हा और ऊदल की सेना के एक महान सेनापति और वीर पुरुष के रूप में जाना जाता है । बारी समुदाय में उन्हें केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि वीरता, राष्ट्रभक्ति और गौरव के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। उनकी जयंती आज भी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है, जो समुदाय के युवाओं के लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है ।
वीरता का प्रतीक
लोककथाओं के अनुसार, रूपन बारी इतने पराक्रमी थे कि यदि वे अपनी आधी तलवार भी म्यान से बाहर खींच लेते थे, तो दुश्मन की आधी सेनाएँ समाप्त हो जाती थीं । यह अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन उनके अदम्य युद्ध कौशल और शौर्य को दर्शाता है। कुछ लोक परंपराएं तो समुदाय की उत्पत्ति को सीधे रूपन बारी जैसे नायकों से जोड़ती हैं, जो उन्हें एक सेवा जाति के बजाय एक योद्धा वंश के रूप में प्रस्तुत करती हैं । यह आख्यान समुदाय को एक martial (योद्धा) पहचान प्रदान करता है, जो सेवा-आधारित पहचान का एक शक्तिशाली पूरक है।
निष्ठा और बलिदान का आख्यान: कीरत बारी की गाथा
बारी समुदाय के गौरवशाली आख्यानों में एक और महत्वपूर्ण कहानी कीरत बारी की है, जो स्वामीभक्ति और बलिदान के सर्वोच्च आदर्शों को दर्शाती है।
कहानी का सार
यह कथा 16वीं शताब्दी के मेवाड़ की है, जब दासी-पुत्र बनवीर ने चित्तौड़ के सिंहासन पर कब्जा करने के लिए महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी और शिशु राजकुमार उदय सिंह को भी मारना चाहता था। उस समय, कीरत बारी नामक एक व्यक्ति ने अपनी जान जोखिम में डालकर राजकुमार के प्राणों की रक्षा की। उसने उदय सिंह को जूठे पत्तलों से भरी एक टोकरी में छिपाया और उसे अपने सिर पर रखकर किले से सुरक्षित बाहर निकाल लिया, जिससे मेवाड़ का वंश बच सका ।
एक नकारात्मक रूढ़ि का खंडन
यह कथा प्रसिद्ध पन्ना धाय के बलिदान की कहानी के समानांतर चलती है, जिन्होंने उदय सिंह को बचाने के लिए उनकी शय्या पर अपने पुत्र चंदन को सुला दिया था । कीरत बारी की कहानी बारी समुदाय को उसी स्तर की स्वामीभक्ति, त्याग और राष्ट्रभक्ति के गौरव से जोड़ती है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कथा एक नकारात्मक सामाजिक रूढ़ि (“जूठा पत्तल उठाने वाली जाति”) का शक्तिशाली खंडन करती है। समुदाय के सदस्य इस बात पर जोर देते हैं कि यह कार्य अपमानजनक नहीं, बल्कि अपने राजा और राज्य के प्रति निष्ठा का सर्वोच्च उदाहरण था। यदि कीरत बारी ने यह साहसिक कार्य न किया होता, तो मेवाड़ का इतिहास कुछ और होता ।
राजपूत वंश का दावा और सामाजिक आकांक्षाएं
उपरोक्त कथाओं के अतिरिक्त, बारी समुदाय में राजपूत मूल का दावा भी प्रचलित रहा है, जो जाति पदानुक्रम में अपनी स्थिति को बेहतर बनाने की सामाजिक आकांक्षा को दर्शाता है।
साक्ष्य और दावे
ब्रिटिश काल के नृवंशविज्ञानी एच.ए. रोज़ (H.A. Rose) ने अपने अध्ययनों में उल्लेख किया है कि बारी समुदाय के लोग स्वयं को राजपूतों का वंशज बताते हैं। उनके गोत्रों के नाम, जैसे ‘चौहान’, इस दावे का समर्थन करते प्रतीत होते हैं । इसके अलावा, विवाह के दौरान राजपूत दुल्हन की तरह हाथीदांत की चूड़ियाँ पहनने की प्रथा जैसी परंपराएं भी इस राजपूत संबंध को मजबूत करने का प्रयास करती हैं । यह दावा समाजशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास द्वारा प्रतिपादित “संस्कृतीकरण” (Sanskritization) की प्रक्रिया का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ एक समुदाय सामाजिक गतिशीलता हासिल करने के लिए उच्च जातियों की प्रथाओं, रीति-रिवाजों और वंश-दावों को अपनाता है।
यह स्पष्ट है कि बारी समुदाय के पास उत्पत्ति आख्यानों का एक विविध “पोर्टफोलियो” है। ये कथाएँ परस्पर अनन्य नहीं हैं, बल्कि एक जटिल सामाजिक रणनीति का हिस्सा हैं। दिव्य उत्पत्ति की कथा उन्हें अनुष्ठानिक शुद्धता प्रदान करती है, रूपन बारी का आख्यान उन्हें योद्धा गौरव देता है, कीरत बारी की कहानी उन्हें सर्वोच्च निष्ठा से जोड़ती है, और राजपूत वंश का दावा उन्हें सामाजिक पदानुक्रम में ऊपर उठाने का प्रयास करता है। यह बहुआयामी पहचान, समुदाय को विभिन्न सामाजिक संदर्भों में अपनी गरिमा और स्थिति को मुखर करने के लिए एक लचीला और शक्तिशाली वैचारिक उपकरण प्रदान करती है।
भाग 3: इतिहास और नृवंशविज्ञान के पन्नों से
पौराणिक आख्यानों से परे, बारी समुदाय का एक लिखित इतिहास भी है, जिसे विशेष रूप से ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के प्रशासकों और नृवंशविज्ञानियों ने दर्ज किया है। ये दस्तावेज़ एक बाहरी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं जो समुदाय की सामाजिक स्थिति, व्यवसायों और उत्पत्ति के बारे में वैकल्पिक सिद्धांत प्रदान करते हैं। इन ऐतिहासिक अभिलेखों का विश्लेषण हमें बारी पहचान की जटिलता और विरोधाभासों को समझने में मदद करता है।
औपनिवेशिक नृवंशविज्ञानियों का दृष्टिकोण: रसेल और रोज़
19वीं और 20वीं शताब्दी के ब्रिटिश प्रशासक-नृवंशविज्ञानियों, जैसे आर.वी. रसेल और एच.ए. रोज़, ने भारतीय जातियों का व्यवस्थित अध्ययन किया। उनके कार्यों में बारी समुदाय का भी विस्तृत वर्णन मिलता है।
बारी की अद्वितीय स्थिति
इन अध्ययनों की सबसे महत्वपूर्ण खोज बारी समुदाय की अद्वितीय सामाजिक स्थिति थी। रसेल और रोज़ दोनों ने इस तथ्य को दर्ज किया कि बारी एक ऐसी जाति थी जिनके हाथ से ब्राह्मण भी पानी स्वीकार कर सकते थे । यह एक असाधारण विशेषाधिकार था, क्योंकि हिंदू समाज में शुद्धता-प्रदूषण के कठोर नियमों के तहत, अधिकांश सेवा जातियों को “अशुद्ध” माना जाता था। इस विशेषाधिकार ने बारी समुदाय को कई अन्य सेवा जातियों से ऊपर एक “शुद्ध” श्रेणी में स्थापित कर दिया, जो उनकी अपनी दिव्य उत्पत्ति की कथा की पुष्टि करता है।
व्यवसाय और कर्तव्य
इन नृवंशविज्ञानियों ने उनके पारंपरिक व्यवसायों का भी दस्तावेजीकरण किया। उनका मुख्य कार्य पत्तल और दोने बनाना था, जिनका उपयोग सभी जातियों द्वारा त्योहारों और भोजों में किया जाता था। इसके अलावा, वे विवाहों, समारोहों और यात्राओं में मशालची (मशाल लेकर चलने वाले) का काम करते थे और उच्च जाति के परिवारों में घरेलू सेवक, विशेषकर पानी पिलाने वाले के रूप में सेवा देते थे ।

महाराष्ट्र में बारी समाज और उनका पान की खेती से गहरा संबंध
मेरे पिछले शोध में बारी समाज की उत्पत्ति और उनके पत्तल-दोने बनाने के पारंपरिक व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित किया गया था, जो मुख्य रूप से उत्तर और मध्य भारत के संदर्भ में था। आपकी प्रतिक्रिया बिल्कुल सही है कि महाराष्ट्र में बारी समुदाय की एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण पहचान उनके पान के पत्तों के काम से जुड़ी हुई है।
शोध करने पर यह स्पष्ट होता है कि महाराष्ट्र में “बारी” और “बरई” (Barai) समुदाय को अक्सर एक साथ देखा जाता है और सरकारी सूचियों में भी इन्हें “बारी या बरई” के रूप में वर्गीकृत किया गया है। हालाँकि पत्तल बनाने वाले बारी और पान की खेती करने वाले बरई के बीच पारंपरिक व्यवसायों में अंतर है, लेकिन सामाजिक रूप से वे एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए हैं।
महाराष्ट्र के संदर्भ में बारी (बरई) समाज की मुख्य पहचान और व्यवसाय इस प्रकार हैं:
1. पान की खेती (नागवेली पान): महाराष्ट्र में, विशेषकर विदर्भ क्षेत्र में, बरई (बारी) समाज पारंपरिक रूप से पान की खेती करने वाला एक प्रमुख समुदाय है। उनके इस व्यवसाय का नाम “बरई” उनके काम से ही निकला माना जाता है। पान के बाग या खेत को “बरेजा” या “बरज” कहा जाता है, और इसी से खेती करने वाले समुदाय का नाम “बरई” पड़ा। यह समुदाय पीढ़ियों से नागवेली पान की खेती करने की कला में निपुण रहा है।
2. महाराष्ट्र में प्रमुख क्षेत्र: यह समुदाय महाराष्ट्र के कई जिलों में फैला हुआ है, लेकिन पान की खेती से जुड़ा उनका काम विशेष रूप से इन क्षेत्रों में केंद्रित है:
- विदर्भ क्षेत्र: अमरावती, अकोला, यवतमाल, बुलढाणा और वर्धा जिलों में बरई समाज की एक बड़ी आबादी है जो पान की खेती और व्यापार से जुड़ी है।
- खानदेश क्षेत्र: जलगाँव और आस-पास के इलाकों में भी इस समुदाय की महत्वपूर्ण उपस्थिति है।
- पश्चिमी महाराष्ट्र: सांगली जैसे जिलों में भी पान की खेती होती है, जिससे यह समुदाय जुड़ा हुआ है।
3. सामाजिक और संगठनात्मक उपस्थिति: महाराष्ट्र में बारी (बरई) समाज एक संगठित समुदाय है। इसका एक अच्छा उदाहरण “मुंबई विभाग बारी समाज विकास मंडल” है, जिसकी स्थापना 1977 में हुई थी। यह संगठन मुंबई और आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय के लोगों को एकजुट करने और सामाजिक कार्यों को बढ़ावा देने का काम करता है। समुदाय के लोग महाराष्ट्र में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत सूचीबद्ध हैं।
निष्कर्ष: यह कहना बिल्कुल सही है कि महाराष्ट्र में बारी समाज की पहचान सिर्फ पत्तल-दोने बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ उनकी एक मजबूत और सम्मानित पहचान पान के कुशल उत्पादक और व्यापारी के रूप में है। यह उनके पारंपरिक व्यवसाय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो महाराष्ट्र की कृषि और संस्कृति में गहराई से समाया हुआ है।
विश्वसनीयता की प्रतिष्ठा
रसेल ने उनकी अपने नियोक्ताओं के प्रति अत्यधिक निष्ठा की प्रतिष्ठा का भी उल्लेख किया है। इस संबंध में एक कहावत प्रचलित थी: ‘बारी अपने मालिक के लिए लड़ते हुए मर जाएगा’ (‘The Bari will die fighting for his master’) । यह प्रतिष्ठा कीरत बारी जैसे नायकों के बलिदान की कहानियों से और मजबूत होती है।
जनजातीय उत्पत्ति का सिद्धांत: नेसफील्ड और शेरिंग
औपनिवेशिक अध्ययनों में एक वैकल्पिक और विरोधाभासी सिद्धांत भी सामने आया, जो बारी समुदाय की उत्पत्ति को जनजातीय समूहों से जोड़ता है।
एक वैकल्पिक दृष्टिकोण
सर एच. रिस्ले ने अपने लेखन में एक अन्य ब्रिटिश अधिकारी, मिस्टर नेसफील्ड के सिद्धांत का उल्लेख किया है। नेसफील्ड का मानना था कि बारी समुदाय वास्तव में बनमानुष (जंगल का आदमी) या मुसहर (चूहा खाने वाली) जैसी “अर्ध-जंगली” जनजातियों की ही एक शाखा है । इस सिद्धांत का आधार उनका पारंपरिक पेशा था—जंगल से पत्ते इकट्ठा करना और उनसे वस्तुएं बनाना। यह कार्य स्वाभाविक रूप से उन वनवासी जनजातियों से जुड़ा था जो जंगलों में निवास करती थीं।
एम.ए. शेरिंग का वर्णन
एक अन्य इतिहासकार, एम.ए. शेरिंग ने भी उन्हें एक आदिवासी जनजाति के रूप में वर्णित किया है, जिनका मुख्य व्यवसाय पत्तों से प्लेट और प्याले बनाना था, साथ ही वे मशालवाहक और नाइयों के रूप में भी काम करते थे ।
सामाजिक उत्थान
इस सिद्धांत के अनुसार, हिंदू समाज में अनुष्ठानिक रूप से शुद्ध माने जाने वाले पत्तल-दोनों की अत्यधिक और सार्वभौमिक मांग के कारण (क्योंकि उच्चतम से लेकर निम्नतम जातियों तक सभी इसका उपयोग करते थे), इस गैर-आर्यन जनजाति की शाखा को एक सम्मानजनक सामाजिक स्थिति प्रदान की गई और उन्हें जाति व्यवस्था में एकीकृत कर लिया गया । यह सिद्धांत बताता है कि कैसे एक व्यावसायिक आवश्यकता एक समूह के सामाजिक उत्थान का कारण बन सकती है।
जाति व्यवस्था के वृहत सिद्धांतों में बारी जाति का स्थान
बारी समुदाय का इतिहास जाति की उत्पत्ति के विभिन्न समाजशास्त्रीय सिद्धांतों को समझने के लिए एक उत्कृष्ट केस स्टडी प्रस्तुत करता है।
- व्यावसायिक सिद्धांत (Occupational Theory): नेसफील्ड द्वारा समर्थित यह सिद्धांत तर्क देता है कि जातियाँ मूल रूप से व्यवसायों के आधार पर विकसित हुईं, और कुछ व्यवसायों को उनकी प्रकृति के आधार पर दूसरों की तुलना में उच्च या निम्न दर्जा दिया गया । बारी जाति का मामला इस सिद्धांत का एक आदर्श उदाहरण है। उनके विशिष्ट “शुद्ध” व्यवसाय (पत्तल बनाना) ने उन्हें जाति पदानुक्रम में एक विशेष और अपेक्षाकृत उच्च स्थान दिलाया।
- परंपरागत/दैवीय सिद्धांत (Traditional/Divine Theory): यह सिद्धांत जातियों की उत्पत्ति को एक दैवीय विधान से जोड़ता है, जैसे कि ब्रह्मा के शरीर के विभिन्न अंगों से वर्णों का जन्म । बारी समुदाय की अपनी दिव्य उत्पत्ति की कथा (परमेश्वर द्वारा मिट्टी से निर्माण) इस सिद्धांत के साथ पूरी तरह से मेल खाती है और उनके आत्म-बोध को पारंपरिक हिंदू विश्व-दृष्टि के भीतर वैधता प्रदान करती है।
- बहु-कारक सिद्धांत (Multi-Factor Theory): अधिकांश आधुनिक समाजशास्त्री मानते हैं कि जाति की उत्पत्ति किसी एक कारक का परिणाम नहीं है, बल्कि यह प्रजातीय, राजनीतिक, व्यावसायिक, धार्मिक और भौगोलिक कारकों का एक जटिल मिश्रण है । बारी समुदाय का इतिहास इस बहु-कारक दृष्टिकोण का प्रबल समर्थन करता है, जिसमें पौराणिक कथाएँ, व्यावसायिक विशेषज्ञता, जनजातीय संबंध और सामाजिक आकांक्षाएं—सभी उनकी पहचान को आकार देने में भूमिका निभाते हैं।
यह ऐतिहासिक विश्लेषण एक मौलिक विरोधाभास को उजागर करता है: एक ओर, बारी समुदाय को एक उच्च अनुष्ठानिक स्थिति प्राप्त थी, जैसा कि ब्राह्मणों द्वारा उनके हाथ से पानी स्वीकार करने की प्रथा से सिद्ध होता है। दूसरी ओर, नृवंशविज्ञानियों ने उन्हें सामाजिक रूप से सबसे निचले पायदान पर मौजूद मुसहर जैसी जनजातियों से जोड़ा, और आधुनिक युग में यह समुदाय अपने सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के कारण आरक्षण जैसे सकारात्मक कार्रवाई की मांग कर रहा है । यह विरोधाभास अनुष्ठानिक स्थिति और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को दर्शाता है। उनका पारंपरिक पेशा, हालांकि अनुष्ठानिक रूप से स्वच्छ था, लेकिन यह उन्हें आर्थिक रूप से शक्तिशाली या भूमि-स्वामी नहीं बनाता था। औद्योगिकीकरण के कारण उनके शिल्प-आधारित आजीविका के पतन ने उनकी आर्थिक कमजोरी को और बढ़ा दिया है। इस प्रकार, बारी समुदाय एक जटिल पहचान का प्रतीक है: पारंपरिक संदर्भ में अनुष्ठानिक रूप से उच्च, लेकिन आधुनिक संदर्भ में सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिए पर।
तालिका 1: बारी जाति की उत्पत्ति से संबंधित प्रमुख आख्यान और सिद्धांत
| सिद्धांत/आख्यान (Theory/Narrative) | मुख्य बिंदु (Key Points) | स्रोत/समर्थक (Source/Proponent) | सामाजिक निहितार्थ (Social Implication) |
| दिव्य उत्पत्ति (परमेश्वर द्वारा) | परमेश्वर ने मिट्टी से प्रथम बारी ‘सुंदर’ का निर्माण किया और उसके हाथ से जल पीकर उसकी जाति की शुद्धता प्रमाणित की। | मौखिक परंपरा, आर.वी. रसेल | अनुष्ठानिक रूप से “शुद्ध” जाति का दर्जा, जिनसे ब्राह्मण भी जल स्वीकार कर सकते हैं। |
| वीर उत्पत्ति (रूपन बारी) | 11वीं सदी के योद्धा आल्हा-ऊदल के सेनापति वीर रूपन बारी के वंशज होने का दावा। | लोक परंपरा, सामुदायिक संगठन | एक योद्धा (मार्शल) पहचान का निर्माण, जो सेवा-आधारित पहचान का पूरक है। |
| निष्ठावान उत्पत्ति (कीरत बारी) | कीरत बारी ने राजकुमार उदय सिंह को पत्तलों की टोकरी में छिपाकर उनकी जान बचाई। | मौखिक परंपरा, सामुदायिक आख्यान | स्वामीभक्ति और बलिदान के सर्वोच्च आदर्शों से जुड़ाव; नकारात्मक रूढ़ियों का खंडन। |
| राजपूत वंश | चौहान जैसे राजपूत गोत्रों से वंश का दावा; राजपूतों जैसी वैवाहिक परंपराओं का पालन। | एच.ए. रोज़ | सामाजिक पदानुक्रम में ऊपर उठने का प्रयास (संस्कृतीकरण)। |
| जनजातीय उत्पत्ति | बनमानुष या मुसहर जैसी वनवासी जनजातियों की एक शाखा, जिनका पेशा पत्ते इकट्ठा करना था। | नेसफील्ड, एम.ए. शेरिंग | यह समुदाय के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन और वैकल्पिक ऐतिहासिक जड़ों को दर्शाता है। |
भाग 4: सामाजिक ताना-बाना: संरचना, व्यवसाय और विस्तार
बारी समुदाय की पहचान केवल उनकी उत्पत्ति की कथाओं और ऐतिहासिक वर्णनों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके सामाजिक संगठन, पारंपरिक व्यवसायों, धार्मिक प्रथाओं और भौगोलिक विस्तार में भी प्रतिबिंबित होती है। यह सामाजिक ताना-बाना उनकी जीवन शैली और आधुनिक चुनौतियों को समझने की कुंजी है।
पारंपरिक व्यवसाय और आर्थिक जीवन
बारी समुदाय का आर्थिक जीवन पारंपरिक रूप से कुछ विशिष्ट सेवाओं और शिल्पों पर केंद्रित था, जो हिंदू समाज की संरचना में गहराई से एकीकृत थे।
पत्तल-दोने का निर्माण
यह बारी समुदाय का केंद्रीय, परिभाषित और सबसे महत्वपूर्ण व्यवसाय रहा है। वे महुआ (Bauhinia Vahlii) या पलाश (Butea frondosa) जैसे पेड़ों के बड़े पत्तों को लकड़ी की छोटी कीलों या सींकों से जोड़कर प्लेटें (पत्तल) और प्याले (दोने) बनाते थे । यह केवल एक शिल्प नहीं था, बल्कि हिंदू अनुष्ठानों, त्योहारों और दैनिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा था। धातु के बर्तनों के विपरीत, पत्तों से बने इन पात्रों को अनुष्ठानिक रूप से शुद्ध माना जाता था और उपयोग के बाद फेंक दिया जाता था, जिससे वे भोज और धार्मिक समारोहों के लिए आदर्श बन जाते थे ।
अन्य सेवाएँ
पत्तल बनाने के अलावा, बारी समुदाय कई अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक कार्य भी करता था। वे विवाहों, उत्सवों और यात्राओं के दौरान मशालवाहक (torchbearers) के रूप में प्रकाश करने का कार्य करते थे। उन्हें उच्च-जाति के हिंदू परिवारों में विश्वसनीय घरेलू सेवक के रूप में भी नियुक्त किया जाता था, जहाँ उनका एक प्रमुख कार्य पानी पिलाना था, जो उनकी “शुद्ध” जाति की स्थिति के कारण संभव था । समय के साथ, समुदाय के कुछ सदस्यों ने कृषि को भी अपनी आजीविका के साधन के रूप में अपनाया ।
आधुनिक चुनौतियाँ
20वीं सदी में औद्योगिकीकरण और मशीनीकरण ने बारी समुदाय के पारंपरिक आर्थिक आधार को लगभग नष्ट कर दिया। मशीनों से बने कागज और प्लास्टिक के डिस्पोजेबल प्लेटों और कपों के आगमन ने हाथ से बने पत्तलों की मांग को समाप्त कर दिया । इस बदलाव ने न केवल उनकी आय का मुख्य स्रोत छीन लिया, बल्कि उनकी उस अद्वितीय पहचान को भी कमजोर कर दिया जो उनके विशेष शिल्प से जुड़ी थी। इस आर्थिक विघटन ने समुदाय को आजीविका के नए स्रोत खोजने और आधुनिक अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया है। यह अनुभव भारत की कई अन्य कारीगर और सेवा जातियों के समान है, जिनके पारंपरिक कौशल आधुनिक तकनीक के सामने अप्रासंगिक हो गए हैं।
इस पारंपरिक व्यवसाय के पतन ने समुदाय को अपनी पहचान पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है। यह केवल आय के नुकसान का मामला नहीं है; यह एक पूरी जीवन शैली और सामाजिक स्थिति के क्षरण का संकट है। इसी संकट की प्रतिक्रिया में, बारी समुदाय ने अपनी पहचान के अन्य मार्करों पर अधिक जोर देना शुरू कर दिया है, जैसे कि वीर नायकों (रूपन बारी) का उत्सव मनाना, राजनीतिक वकालत के लिए आधुनिक संगठन बनाना और आरक्षण श्रेणियों में शामिल होने के लिए संघर्ष करना। उनकी कहानी इस बात का एक जीवंत उदाहरण है कि कैसे भारत की कारीगर जातियाँ पारंपरिक व्यवसाय-आधारित पहचान से राजनीतिक और सामाजिक लामबंदी-आधारित पहचान की ओर बढ़ रही हैं।
तालिका 2: बारी जाति का पारंपरिक एवं आधुनिक व्यवसाय
| व्यवसाय (Occupation) | विवरण (Description) | ऐतिहासिक संदर्भ (Historical Context) | वर्तमान स्थिति (Current Status) |
| पत्तल-दोना निर्माण | महुआ, पलाश आदि के पत्तों से हाथ से प्लेटें और प्याले बनाना। | मुख्य और परिभाषित पेशा; अनुष्ठानिक रूप से शुद्ध माना जाता था और सभी जातियों द्वारा उपयोग किया जाता था । | मशीनों से बने उत्पादों के कारण लगभग विलुप्त; बहुत सीमित स्थानीय बाजारों में ही जीवित है । |
| मशालवाहक | विवाह, उत्सवों और यात्राओं के दौरान मशाल लेकर प्रकाश करना। | एक महत्वपूर्ण अनुष्ठानिक और व्यावहारिक सेवा । | बिजली और आधुनिक प्रकाश व्यवस्था के कारण यह पेशा पूरी तरह समाप्त हो गया है। |
| घरेलू सेवा | उच्च-जाति के परिवारों में घरेलू नौकर, विशेषकर पानी पिलाने वाले के रूप में कार्य करना। | उनकी “शुद्ध” जाति की स्थिति के कारण यह एक विश्वसनीय भूमिका थी । | अभी भी कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है, लेकिन अब जाति-विशिष्ट नहीं है। |
| कृषि | छोटे किसान या खेतिहर मजदूर के रूप में कार्य करना। | कुछ बारी परिवारों के लिए आजीविका का एक सहायक स्रोत था । | कई लोगों के लिए आजीविका का एक प्रमुख स्रोत बन गया है, हालांकि अधिकांश भूमिहीन हैं। |
| आधुनिक विविध पेशे | सरकारी नौकरी, निजी क्षेत्र में रोजगार, व्यापार, मजदूरी आदि। | पारंपरिक व्यवसायों के पतन के बाद समुदाय ने इन क्षेत्रों में प्रवेश किया है। | समुदाय शिक्षा और आरक्षण के माध्यम से इन क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए प्रयासरत है । |
सामाजिक संगठन और संरचना
बारी समुदाय का सामाजिक संगठन उनके भौगोलिक विस्तार, आंतरिक उप-विभाजनों और पारिवारिक रीति-रिवाजों से मिलकर बना है।
- भौगोलिक वितरण: बारी समुदाय मुख्य रूप से उत्तर और मध्य भारत के राज्यों में फैला हुआ है। उनकी महत्वपूर्ण आबादी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा जैसे राज्यों में पाई जाती है ।
- उप-विभाजन और गोत्र (ओडिशा के विशेष संदर्भ में): समुदाय के भीतर भी एक जटिल सामाजिक संरचना मौजूद है। इसका एक स्पष्ट उदाहरण ओडिशा में मिलता है, जहाँ बारी समुदाय पाँच अंतर्विवाही (endogamous) समूहों में विभाजित है: गोलायत, सूर्यबंसी, कुमारदाग, लिंगायत और गांधली। इसका अर्थ है कि इन समूहों के सदस्य सामान्यतः अपने ही समूह के भीतर विवाह करते हैं। ये समूह आगे कई बहिर्विवाही (exogamous) गोत्रों (जिन्हें ‘कुल’ कहा जाता है) में विभाजित हैं, जिनके सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते । यह आंतरिक स्तरीकरण समुदाय के भीतर एक पदानुक्रमित और जटिल सामाजिक व्यवस्था को दर्शाता है।
- विवाह और पारिवारिक रीति-रिवाज: बारी समुदाय में आम तौर पर वयस्क विवाह और एक विवाह (monogamy) का पालन किया जाता है। व्यवस्थित विवाह (arranged marriages) को प्राथमिकता दी जाती है। कई अन्य हिंदू समुदायों की तरह, उनमें भी विधवा, विधुर और तलाकशुदा व्यक्तियों के पुनर्विवाह की सामाजिक स्वीकृति है। समय के साथ, दुल्हन मूल्य (‘डापा’) देने की पुरानी प्रथा अब दहेज प्रथा में बदल रही है, जो एक व्यापक सामाजिक परिवर्तन का संकेत है ।
धार्मिक जीवन एवं कुल-परंपरा
बारी समुदाय की धार्मिक पहचान हिंदू धर्म की मुख्य धारा से गहराई से जुड़ी हुई है, लेकिन इसमें उनकी अपनी विशिष्ट कुल-परंपराएं भी शामिल हैं।
- हिंदू धर्म का पालन: बारी समुदाय पूर्ण रूप से हिंदू धर्म का पालन करता है और होली, दिवाली जैसे सभी प्रमुख हिंदू त्योहारों को मनाता है ।
- कुलदेवता परंपरा का महत्व: भारतीय समाज में, विशेषकर हिंदू परिवारों में, कुलदेवता या कुलदेवी की परंपरा का अत्यधिक महत्व है। ये कुल या वंश के रक्षक देवता होते हैं और परिवार की पहचान, एकता और निरंतरता के प्रतीक माने जाते हैं। जन्म, विवाह जैसे मांगलिक कार्यों में इनकी पूजा अनिवार्य होती है। यह परंपरा परिवार को न केवल अपने पूर्वजों से, बल्कि अपने बिखरे हुए वंश के अन्य सदस्यों से भी जोड़ती है ।
- बारी समाज के आराध्य देव: बारी समुदाय में भी कुलदेवता की पूजा की परंपरा प्रचलित है। इसका एक प्रमुख उदाहरण लखनऊ के पास इटौंजा के उसना गाँव में स्थित भगवान नरसिंह का भव्य मंदिर है, जिसकी स्थापना बारी समुदाय के सदस्यों द्वारा की गई थी । यह मंदिर इंगित करता है कि भगवान नरसिंह उनके महत्वपूर्ण आराध्य या कुलदेवता हो सकते हैं। इसके अलावा, भैरव (भैरू जी) जैसे शक्तिशाली लोक देवताओं की भी कई क्षेत्रों में पूजा की जाती है, जो स्थानीय धार्मिक विश्वासों के प्रभाव को दर्शाता है ।
भाग 5: समकालीन यथार्थ और भविष्य की दिशा
बारी समुदाय का इतिहास केवल अतीत की कथाओं में ही नहीं, बल्कि उनके समकालीन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक यथार्थ में भी जीवंत है। पारंपरिक व्यवसायों के पतन के बाद, समुदाय ने आधुनिक भारत की चुनौतियों और अवसरों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया को नए तरीकों से आकार दिया है। आज वे अपनी पहचान को संरक्षित करने और अपने अधिकारों की वकालत करने के लिए संगठित हो रहे हैं।
आधुनिक सामाजिक-राजनीतिक स्थिति
आधुनिक भारत में, जाति की पहचान सामाजिक और राजनीतिक लामबंदी का एक महत्वपूर्ण आधार है। बारी समुदाय भी इस प्रक्रिया का हिस्सा है।
आरक्षण और वर्गीकरण
उनके ऐतिहासिक रूप से सेवा-आधारित और आर्थिक रूप से कमजोर पेशे के कारण, बारी समुदाय को भारत के विभिन्न राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) या अनुसूचित जाति (SC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है । यह वर्गीकरण उनके सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की आधिकारिक स्वीकृति है और उन्हें शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण जैसे राज्य के सकारात्मक कार्रवाई के लाभों तक पहुँचने में मदद करता है। समुदाय के नेता और संगठन लगातार सरकार से अपने समुदाय को “अति पिछड़ा वर्ग” (Most Backward Class) की श्रेणी में शामिल करने की मांग कर रहे हैं, ताकि उन्हें आरक्षण का अधिक लक्षित लाभ मिल सके ।
बिहार जाति सर्वेक्षण 2022 के विशेष संदर्भ में
हाल ही में बिहार सरकार द्वारा जारी जाति सर्वेक्षण (2022-23) की रिपोर्ट ने बारी समुदाय की समकालीन जनसांख्यिकी और सामाजिक संरचना पर महत्वपूर्ण और सटीक आँकड़े प्रदान किए हैं।
जनसांख्यिकीय आँकड़े
इस सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, बिहार राज्य में हिंदू ‘बारी’ जाति की कुल जनसंख्या 61,003 है । यह आँकड़ा राज्य की नीति-निर्माण और राजनीतिक विमर्श में समुदाय की उपस्थिति को एक ठोस आधार प्रदान करता है।
बारी और बौरी का भेद: धर्म आधारित विभाजन
यह सर्वेक्षण एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक भेद को भी उजागर और आधिकारिक रूप से दर्ज करता है—’बारी’ और ‘बौरी’ के बीच का अंतर। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि ‘बारी’ वे हैं जो हिंदू धर्म का पालन करते हैं, जबकि ‘बौरी’ (जिनकी जनसंख्या 3,250 है) वे हैं जिन्होंने इस्लाम जैसे अन्य धर्मों को अपना लिया है । ऐतिहासिक रूप से, दोनों समूह एक ही वंश और पारंपरिक व्यवसाय (पत्ते के पात्र बनाना) से जुड़े थे, लेकिन समय के साथ धार्मिक पहचान ने उन्हें दो अलग-अलग और कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त समुदायों में विभाजित कर दिया है ।
यह विभाजन भारत में जाति और धर्म के जटिल अंतर्संबंध का एक स्पष्ट और समकालीन उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि कैसे एक ही व्यावसायिक समूह (जाति) धार्मिक रूपांतरण के आधार पर दो अलग-अलग सामाजिक-राजनीतिक पहचानों में बँट सकता है। यह इस धारणा को चुनौती देता है कि जाति केवल एक हिंदू सामाजिक संरचना है और यह प्रदर्शित करता है कि आधुनिक भारत में धार्मिक पहचान कैसे सामुदायिक गठन और विभाजन की एक जीवंत प्रक्रिया को संचालित कर सकती है।
तालिका 3: बिहार जाति सर्वेक्षण 2022 के अनुसार बारी/बौरी समुदाय
| समुदाय (Community) | धर्म (Religion) | जनसंख्या (Population – 2022 Survey) | मुख्य बिंदु (Key Point) |
| बारी (Bari) | हिंदू (Hindu) | 61,003 | हिंदू पहचान वाले पारंपरिक समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं । |
| बौरी (Bauri) | गैर-हिंदू (मुख्यतः मुस्लिम) | 3,250 | उसी वंश और पेशे से उत्पन्न, लेकिन धार्मिक रूपांतरण के कारण एक अलग समुदाय के रूप में पहचाने जाते हैं । |
सामुदायिक चेतना और संगठनात्मक प्रयास
आधुनिक युग में बारी समुदाय के भीतर एक नई सामाजिक और राजनीतिक चेतना का उदय हुआ है। अपनी विरासत को संरक्षित करने और अपने अधिकारों की वकालत करने के लिए, समुदाय ने कई आधुनिक संगठन बनाए हैं।
- आधुनिक संगठनों का उदय: ‘भारतीय बारी समाज’ जैसे राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय संगठन अब समुदाय के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए सक्रिय हैं । ये संगठन समुदाय के बिखरे हुए सदस्यों को एक मंच पर लाने का काम कर रहे हैं।
- संगठनों के उद्देश्य: इन संगठनों के कई उद्देश्य हैं। वे सामाजिक एकता को बढ़ावा देने, समुदाय में व्याप्त अशिक्षा को दूर करने और युवाओं को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास कर रहे हैं । वे अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, जैसे पुराने किलों और मंदिरों, के संरक्षण के लिए भी अभियान चला रहे हैं । राजनीतिक रूप से, ये संगठन सरकार के समक्ष समुदाय की मांगों को रखते हैं और राजनीतिक दलों से समुदाय को उचित सम्मान और प्रतिनिधित्व देने की अपील करते हैं । इसके अलावा, वे रूपन बारी जैसे सामुदायिक नायकों की जयंती मनाकर और सामाजिक सम्मान समारोह आयोजित करके समुदाय में आत्म-सम्मान और गौरव की भावना को मजबूत करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं ।
भाग 6: निष्कर्ष – आख्यान, इतिहास और अस्मिता का संश्लेषण
बारी समुदाय का वृहत इतिहास पहचान, सम्मान और अस्तित्व के लिए एक सतत यात्रा का प्रतीक है। यह यात्रा दिव्य उत्पत्ति की गौरवपूर्ण पौराणिक कथाओं से आरंभ होकर, मध्यकालीन वीरता के आख्यानों से शक्ति प्राप्त करती है, औपनिवेशिक काल के विरोधाभासी दस्तावेजीकरण से गुजरती है, और अंततः आधुनिक भारत की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के यथार्थ से टकराती है। यह कहानी भारतीय समाज के भीतर एक सेवा-आधारित कारीगर जाति के उत्थान, संघर्ष और अनुकूलन का एक अनूठा और प्रेरक अध्याय प्रस्तुत करती है।
एक जटिल विरासत का सारांश
इस विस्तृत विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि बारी समुदाय की पहचान एक-आयामी नहीं, बल्कि बहुआयामी है। उनकी विरासत में एक गहरा विरोधाभास निहित है: एक ओर, वे अपनी दिव्य उत्पत्ति की कथा के माध्यम से एक अद्वितीय अनुष्ठानिक शुद्धता का दावा करते हैं, जिसे ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मणों द्वारा उनके हाथ से जल ग्रहण करने की प्रथा से मान्यता मिली थी। दूसरी ओर, नृवंशविज्ञानियों ने उन्हें सामाजिक रूप से सबसे वंचित जनजातीय समूहों से जोड़ा, और उनका पारंपरिक पेशा, जो उनकी पहचान का केंद्र था, आर्थिक रूप से उन्हें कभी शक्तिशाली नहीं बना सका। आज, उसी आर्थिक कमजोरी के कारण वे आरक्षण के माध्यम से सामाजिक न्याय की मांग कर रहे हैं, जो उनकी जटिल और स्तरित सामाजिक स्थिति को उजागर करता है।
आख्यान बनाम यथार्थ
बारी समुदाय का इतिहास ‘आख्यान’ (narrative) और ‘यथार्थ’ (reality) के बीच के संबंध को समझने का एक उत्कृष्ट अवसर प्रदान करता है। उनकी पौराणिक कथाएँ (आख्यान) उनके सामाजिक सम्मान, शुद्धता और गौरव के दावे को दर्शाती हैं—ये वे वैचारिक उपकरण हैं जिनका उपयोग उन्होंने जाति पदानुक्रम की कठोरता के बीच अपनी गरिमा को बनाए रखने के लिए किया। वहीं, ऐतिहासिक और समकालीन यथार्थ उनके आर्थिक संघर्षों, पारंपरिक व्यवसायों के पतन और सामाजिक गतिशीलता की तत्काल आवश्यकता को उजागर करता है। यह समुदाय इन दोनों ध्रुवों के बीच संतुलन साधने का निरंतर प्रयास कर रहा है।
भविष्य की ओर
भविष्य की ओर देखते हुए, बारी समुदाय अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक गौरव को अपनी समकालीन सामाजिक-आर्थिक आकांक्षाओं के साथ सफलतापूर्वक एकीकृत कर रहा है। सामुदायिक संगठनों का उदय, बढ़ती राजनीतिक चेतना और शिक्षा पर बढ़ता जोर इस बात का संकेत है कि वे अपनी नियति को आकार देने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। वे अब केवल अपने अतीत के गौरव पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि एक संगठित शक्ति के रूप में आधुनिक भारत में अपने अधिकारों और अवसरों का दावा कर रहे हैं।
अंततः, बारी जाति की कहानी केवल एक समुदाय का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज के व्यापक परिवर्तन का एक सूक्ष्म प्रतिबिंब है। यह दिखाती है कि कैसे परंपरा और आधुनिकता, आख्यान और यथार्थ, तथा गौरव और संघर्ष एक साथ मिलकर एक जीवंत और विकासशील पहचान का निर्माण करते हैं। उनकी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि समर्पण, साहस, संगठन और अपनी विरासत पर गर्व के साथ कोई भी समुदाय सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना कर सकता है और एक सम्मानित भविष्य का निर्माण कर सकता है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
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